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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

२३ मार्च शहीदी दिवस

'इन्दम राष्ट्राय, इन्दम न मम', सब कुछ राष्ट्र का है, हमारा राष्ट्र के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। 23 मार्च 1931 को अपने प्राण अर्पित करने वाले तीन भारतीय रत्‍‌न भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु थे। चंद्रशेखर आजाद प्रजातांत्रिक हिन्दुस्तान सेना के संचालक थे। क्रांतिकारियों के डर से अंग्रेज सरकार की नींद उड़ गई। अंग्रेज सरकार पकड़ने के लिए जगह-जगह छापे मार रही थी। कोई पकड़ में नहीं आ रहा था। भरसक यत्‍‌न करने पर चंद्रशेखर आजाद को चारों ओर से घेर लिया। फिर भी पुलिस के हाथ नहीं आए। वह अपने आप पर गोली चला कर वीर गति को प्राप्त हुए।

20 अक्तूबर 1928 को लाहौर आने पर साइमन कमीशन का जोरदार विरोध हुआ। लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसने के कारण 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई। सुखदेव ने जिम्मेवार पुलिस अधीक्षक स्टाक को मारने की योजना बनाई, परंतु उस दिन स्टाक कार्यालय में न होने पर उपस्थित उपाधीक्षक सांडर्स ही गोलियों का शिकार हो गया। भगत सिंह, राज गुरु पकड़े गए। उनका साथी जय गोपाल पुलिस का मुखविर हो गया। इसलिए फांसी होना निश्चित था।

8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंक कर भगत सिंह ने लोगों को संबोधित किया कि 'हम मारने नहीं आए हैं, केवल स्वतंत्रता के लिए राष्ट्र की परिस्थितियां दर्ज कराने आए हैं।' बम कांड के मुकदमे में सजा व सांडर्स की हत्या पर भगत सिंह, राज गुरु व सुखदेव को फांसी हुई। 23 मार्च 1931 को फांसी के पश्चात उनके शरीरों को सतलुज के किनारे जला दिया गया। घर वालों को मृतक शरीर भी नसीब नहीं हुए। फांसी पर चढ़ते हुए यही आवाज निकल रही थी 'इंक्लाब जिंदाबाद।' जेल में लिखी हुई पंक्तियां हमें भी प्रेरणा देती रहेंगी।

'दिल से निकलेगी न मर कर भी उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी'
Photo: 'इन्दम राष्ट्राय, इन्दम न मम', सब कुछ राष्ट्र का है, हमारा राष्ट्र के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। 23 मार्च 1931 को अपने प्राण अर्पित करने वाले तीन भारतीय रत्‍‌न भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु थे। चंद्रशेखर आजाद प्रजातांत्रिक हिन्दुस्तान सेना के संचालक थे। क्रांतिकारियों के डर से अंग्रेज सरकार की नींद उड़ गई। अंग्रेज सरकार पकड़ने के लिए जगह-जगह छापे मार रही थी। कोई पकड़ में नहीं आ रहा था। भरसक यत्‍‌न करने पर चंद्रशेखर आजाद को चारों ओर से घेर लिया। फिर भी पुलिस के हाथ नहीं आए। वह अपने आप पर गोली चला कर वीर गति को प्राप्त हुए।

20 अक्तूबर 1928 को लाहौर आने पर साइमन कमीशन का जोरदार विरोध हुआ। लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसने के कारण 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई। सुखदेव ने जिम्मेवार पुलिस अधीक्षक स्टाक को मारने की योजना बनाई, परंतु उस दिन स्टाक कार्यालय में न होने पर उपस्थित उपाधीक्षक सांडर्स ही गोलियों का शिकार हो गया। भगत सिंह, राज गुरु पकड़े गए। उनका साथी जय गोपाल पुलिस का मुखविर हो गया। इसलिए फांसी होना निश्चित था।

8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंक कर भगत सिंह ने लोगों को संबोधित किया कि 'हम मारने नहीं आए हैं, केवल स्वतंत्रता के लिए राष्ट्र की परिस्थितियां दर्ज कराने आए हैं।' बम कांड के मुकदमे में सजा व सांडर्स की हत्या पर भगत सिंह, राज गुरु व सुखदेव को फांसी हुई। 23 मार्च 1931 को फांसी के पश्चात उनके शरीरों को सतलुज के किनारे जला दिया गया। घर वालों को मृतक शरीर भी नसीब नहीं हुए। फांसी पर चढ़ते हुए यही आवाज निकल रही थी 'इंक्लाब जिंदाबाद।' जेल में लिखी हुई पंक्तियां हमें भी प्रेरणा देती रहेंगी।

'दिल से निकलेगी न मर कर भी उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी'

1 टिप्पणी:

  1. जय हिंद ! आओ वीरों , काले अंग्रेजों के राज्य कोउखाड़ फेंके !रोज कुछ वक्त देश को दें ताकि अपनी , परिवार जनों और समस्त देश वासियों की अस्मिता सुरक्षित रहे |

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